Wednesday, 17 January 2018

वो जीता नही विजेता है

जिंदगी एक सवाल सी बन गई है,
हम उलझे हैं उन सवालों में,
जो जिनका कोई मोल नहीं,
वो बातें हैं, बस बातें है,

जितना प्रयास किया हमने,
उन बातों को सुलझाने का,
उतना ही लिपट गया उसमे,
उन लोगों को समझाने में,

जीवन को कठिन समझना ही,
प्रकृति का बस एक खेल है,
प्रकृति को जिसने समझ लिया,
वो जीता नही विजेता हैं।

Thursday, 30 November 2017

विद्यार्थियों के पांच लक्षण

काकचेष्टा वको ध्यान्म् श्वाननिद्रा तथैव च
अल्पाहारी गृहत्यागी विद्यार्थी पंच लक्षणम् ।।

एक विद्यार्थी को कौव्वे की तरह जानने की चेष्टा करते रहना चाहिए, बगुले की तरह मन लगाना(ध्यान करना) चाहिए, कुत्ते की तरह अर्धनिद्रा मे सोना चाहिए, काम से काम और आवश्यकतानुसार खाना चाहिए और गृहत्यागी आवश्य ही होना चाहिए।

चिरंजीवी

अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषण: । 
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरजीविनः ॥ 

सप्तचिरञ्जीविनां नामानि - 
• अश्वत्थामा 
• बलिः 
• व्यासः 
• हनूमान् 
• विभीषणः 
• कृपः 
• परशुरामः

ये सात चिरंजीवी(हमेशा जीवित रहने वाले) हैं - अश्वत्थामा, बाली, वेदव्यास, हनुमान, विभीषण, कृप, परशुराम |

Monday, 16 October 2017

मुर्ख

जो किसी विषय को बिना समझे ग्रहण करे तत्पश्चात उसका अनुसरण और प्रसार करे , वो स्वयं तो मुर्ख ही होता है और दूसरो को भी मुर्ख बनाता है।
                                                     ~नीरज त्रिपाठी

Sunday, 15 October 2017

मुर्खता

मुर्खता उस व्यक्तित्व को प्रदर्शित करता है जो बिना विचार किसी भी निर्थक बातो को ग्रहण कर लेता है।

Saturday, 14 October 2017

धर्म


     धर्म का अर्थ है धारण करने वाला अथवा जिसे धारण किया गया है। धारण करने वाला जो है उसे आत्मा कहा गया है और जिसे धारण किया है वह प्रकृति है। आत्मा इस संसार का बीज अर्थात पिता है और प्रकृति गर्भधारण करने वाली योनि अर्थात माता है।

धर्म शब्द का प्रयोग गीता में आत्म स्वभाव एवं जीव स्वभाव के लिए जगह जगह प्रयुक्त हुआ है। इसी परिपेक्ष में धर्म एवं अधर्म को समझना आवश्यक है। आत्मा का स्वभाव धर्म है अथवा कहा जाय धर्म ही आत्मा है। आत्मा का स्वभाव है पूर्ण शुद्ध ज्ञान, ज्ञान ही आनन्द और शान्ति का अक्षय धाम है। इसके विपरीत अज्ञान, अशांति, क्लेश और अधर्म का द्योतक है।

आत्मा अक्षय ज्ञान का स्रोत है। ज्ञान शक्ति की विभिन्न मात्रा से क्रिया शक्ति का उदय होता है, प्रकति का जन्म होता है। प्रकृति के गुण सत्त्व, रज, तम का जन्म होता है। सत्त्व-रज की अधिकता धर्म को जन्म देती है, तम-रज की अधिकता होने पर आसुरी वृत्तियाँ प्रबल होती और धर्म की स्थापना अर्थात गुणों के स्वभाव को स्थापित करने के लिए, सतोगुण की वृद्धि के लिए, अविनाशी ब्राह्मी स्थिति को प्राप्त आत्मा अपने संकल्प से देह धारण कर अवतार गृहण करती है।

उपसंहार :- धर्म किसी व्यक्ति को नही दर्शाता बल्कि आत्मियता को दर्शाता है।

नाराजगी

नाराजगी भी एक खूबसूरत रिश्ता निभाती है ,
कभी अपनो पे आती है ,
कभी अपने पे आती है ।
                                 ~ नीरज प्रसाद त्रिपाठी