यूरोपियन प्रबोध की भाषा "लैटिन" जब किसी प्राणी की "जाति" और "प्रजाति" का परिचय एक "पारिभाषिक" शब्दावली के साथ देती है, तो वह मनुष्य को ठीक वैसे ही "होमो-सेपियन्स" कहकर पुकारती है, जैसे, मिसाल के तौर पर, सिंहों को "पैंथेरा-लियो" कहा जाता है। यहां "पैंथेरा" एक "जाति-समूह" है, जिसमें शेर, चीता, बाघ, तेंदुआ जैसी "बड़ी बिल्लियां" आती हैं, और "लियो" उस जाति-समूह की विशेष प्रजाति। इसी आधार पर अगर "होमो-सेपियन्स" शब्द की पड़ताल करें तो पाएंगे कि इसमें "होमो" तो एक जाति-समूह है और "सेपियन्स" उसकी एक विशेष प्रजाति है। सहसा सवाल उठता है कि तब "होमो" जाति-समूह के अन्य प्राणियों का क्या हुआ, और इनमें से केवल "सेपियन्स" ही आज कैसे शेष रह गए?
यह "विकासक्रम" का एक ऐसा रहस्य है, जिसे मनुष्य ने सालों तक छुपाकर रखा था!
और वह रहस्य यह है कि मनुष्य "होमो सेपियन्स" का पर्याय नहीं है। मनुष्य केवल "होमो" जाति-समूह की एक प्रजाति है, और आज से महज़ 70 हज़ार साल पहले तक इस धरती मनुष्यों की कोई 6 प्रजातियां अस्तित्व में थीं!
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युवल नोह हरारी की किताब "सेपियन्स" के केंद्र में यही स्थापना थी कि आज भले ही तमाम "होमो" में से केवल हम "सेपियन्स" ही शेष रह गए हों, लेकिन ऐसा नहीं है कि हम इस धरती पर मनुष्यों की उत्पत्ति के साथ ही प्रारंभ से थे। वास्तव में "होमो इरेक्टस" नामक एक मनुष्य-प्रजाति का अस्तित्व इस धरती पर पूरे 20 लाख सालों तक रहा था! इतनी लंबी अवधि में अपनी जाने कैसी दुनिया बसाकर वे लोग धरती से विदा हो गए। इनकी तुलना में "होमो सेपियन्स" तो अभी महज़ 2 लाख साल पहले ही अस्तित्व में आए हैं और माना जा रहा है कि अगले 1 हज़ार सालों में "होमो सेपियन्स" का लोप हो जाएगा और मनुष्यों की कोई नई प्रजाति धरती पर अस्तित्व में आएगी। हरारी ने तो इन्हें पहले ही "होमो दियस" कहकर पुकार लिया है।
पहले मनुष्य को यह सच स्वीकार करने में शर्म आती थी कि वह बंदरों की संतान है, कि गोरिल्ला, ओरांगउटान और चिम्पैंज़ियों के परिवार से हमारा इतना क़रीबी रिश्ता रहा है कि कोई 60 लाख साल पहले जब एक मादा वानर ने दो बेटियों को जन्म दिया था, तो उनमें से एक ने आगे जाकर उन सभी "चिम्पैंज़ियों" के पूर्वजों को जन्म दिया था, जिन्हें आज हम धरती पर देखते हैं, और दूसरी आगे जाकर हम सभी मनुष्यों की "परनानी" कहलाई थी!
विकास-क्रम की श्रंखला कुछ ऐसी है कि पहले हम वानरों के जाति-समूह से अलग हुए और "होमो" नामक हमारा स्वयं का एक जाति-समूह विकसित हुआ। फिर हमने "होमो" जाति-समूह के अन्य मनुष्यों से भी स्वयं को पृथक किया और अंतत: "सेपियन्स" के रूप में ही हमारा अस्तित्व बचा। लेकिन "सेपियन्स" ही इकलौते मनुष्य हैं, यह विज्ञान की किताबों द्वारा हमसे बोला गया सबसे बड़ा झूठ है!
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धरती पर कोई 25 लाख साल पहले, अफ्रीका में "होमो" वंश के पहले मनुष्यों की उत्पत्ति हुई थी। और पिछले क़रीब 10 हज़ार सालों से इकलौते "सेपियन्स" ही इस धरती पर शेष रह गए हैं। लेकिन आज से 25 लाख वर्ष पूर्व से लेकर आज से 10 हज़ार वर्ष पूर्व की अवधि के दौरान जो और मनुष्य अस्तित्व में रहे थे, वे कौन थे और कैसे थे?
जो सही मायनों में "आदिमानव" थे, वे पूर्वी अफ्रीका में रहते थे और "सदर्न एप" कहलाते थे। उस "लैंडस्केप" में पूरे 5 लाख साल बिताने के बाद कोई 20 लाख साल पहले उन्होंने उत्तरी अफ्रीका, एशिया और यूरोप की ओर "माइग्रेशन" प्रारंभ किया। इस कारण मनुष्यों की विभिन्न प्रजातियों का विकास हुआ। इनमें सबसे महत्वपूर्ण थे यूरोप और पश्चिमी एशिया में रहने वाले "निएंडर्थल"। "निएंडर्थल" बहुत हद तक "होमो सेपियंस" से मिलते-जुलते थे किंतु वे "आजानुबाहु" हुआ करते थे, यानी उनके हाथ उनके घुटनों तक लंबे थे। बाद में भी अनेक विलक्षण मनुष्य "आजानुबाहु" पाए गए हैं। क्या उनमें "निएंडर्थल्स" के कोई जीन्स शेष रह गए होंगे?
"होमो इरेक्टस" के बारे में हम पहले बात कर चुके हैं। ये लंबे-तगड़े मनुष्य पूर्वी एशिया में पाए जाते थे। इंडोनेशिया के जावा द्वीप पर जिन पुरामानवों के अवशेष मिले हैं, उन्हें "होमो सोलोएन्सिस" कहा गया है। इंडोनेशिया में ही बौने मनुष्यों की भी एक प्रजाति पाई जाती थी, जो "होमो फ़्लोरेन्सिस" कहलाती थी। ये महज़ 1 मीटर लंबे और 25 किलो वज़नी हुआ करते थे। वर्ष 2010 में साइबेरिया से मनुष्यों की एक और प्रजाति का पता लगाया गया। इन्हें "होमो देनिसोवा" कहकर पुकारा गया। इसी कड़ी में आप "होमो रूदोल्फ़ेन्सिस" और "होमो इर्गेस्टर" को भी जोड़ सकते हैं। "होमो इर्गेस्टर" शब्द का अर्थ होता है : "कामकाजी मनुष्य।" सबसे अंत में मनुष्यों की जो प्रजाति अस्तित्व में आई, "होमो सेपियन l
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